मनीष वैद्य

बीतते समय के साथ कविता ख़ुद को रचती है धीरे-धीरे

“कविता अर्थ के खिलाफ़ एक शाश्वत संघर्ष है। दो अति हैं : कविता सारे अर्थों को समेट लेती है, यह सारे अर्थों का अर्थ है; या फिर कविता भाषा को किसी भी तरह का अर्थ ढोने से वंचित करती है। .... कोई भी तब तक कवि नहीं है, जब तक उसे अपने भीतर भाषा को नष्ट करने और एक दूसरी भाषा को सिरजने के आकर्षण ने लुभाया नहीं है। जब तक उसने अर्थशून्यता के आकर्षण को और अभिव्यक्त न किए जा सकने वाले अर्थ के भय....

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