मनीषा अरोड़ा

स्त्री-घुमक्कड़ी और मुक्ति के प्रश्न वाया सांकृत्यायन 

“खट्टे-मिट्ठे किस्से सुनते-सुनाते/घर को पीठ पर लादे,रेलवे पुल पर खड़ी हो /जीवन को भर देना चाहती हूँ यात्राओं से / तंग आ चुकी हूँ /खिड़की से आसमान देखते-देखते”। घुमक्कड़ी और स्त्री-मुक्ति के बीच कैसे नाव और पतवार का संबंध है, नीलेश रघुवंशी की यह कविता इसका ठीक-ठीक पता देती है। स्त्री अपने हिस्से के आसमान को पाने का संघर्ष शताब्दियों से कर रही है। क्या यायावरी भी स्त्री को मुक....

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