वंदना जोशी कांडपाल

अनुभूति

इतराती थी उपवन में वो लता
थी शोभा उपवन की वो लता
सुकून था जीवन में,  सहलाती थी पवन
दुलारती थी वृष्टि, पोषित करता था चमन।

पर लता नहीं, वृक्ष बनूँगी मैं
क्योकि आश्रित नहीं, जीवन दायिनी हूँ मैं
गर्व है मुझे, बहते जीवन द्रव पर,
भरोसा है मुझे, अपनी धरा पर ।


तभी, जोर, हवा का झोंका आया
पटका ज़मीं पर, उसको उखाड़ा
दी चुनौत....

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