- श्रेणियाँ
- कहानी
- चिट्ठी आई है
- मेरी बात
- रचनाकार
- पाखी परिचय
- पिछले अंक
- संपर्क करें
तुम समझते क्यों नहीं?
आखिर क्या समझाना चाहती हो? जरा मैं भी तो सुनूं!
सुनने-समझने को बचा ही क्या है? हुकूमत के खिलाफ लिखते हो, हुकूमत तुम्हें जेल में डाल देगी।
यह बात गलत है कि मैं सत्ता के खिलाफ लिखता हूं, मैं केवल अपनी बात कहता हूं, अपने नजरिये से!
मगर! उन्हें कौन समझाएगा? वो किसी की सुनते नहीं हैं।
न जाने कितने लेखक, अदीब, सोशल वर्कर्स जेलों में बंद है।....
