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वे आ गए हैं
वे फिर से आ गए हैं
वे गए ही कब थे !
वे कहाँ नहीं हैं
वे हैं कौन ?
अरे वही
जो हर चमक का गुलाम बनाकर
उसे बटोरने की आजा़दी देते हैं
जिनकी बदौलत अच्छे दिनों में
अच्छे से रहते हैं हम !
वे छड़ी घुमाकर खेतों में
अन्न की जगह उगा सकते हैं
इमारतें और चमकदार बस्तियाँ
वे खदेड़ सकते हैं धरती पुत्रों को
....
