नीरज खरे

वे व्याप्त हैं ईश्वर की तरह

वे आ गए हैं
वे फिर से आ गए हैं
वे गए ही कब थे !
वे कहाँ नहीं हैं
वे हैं कौन ?

अरे वही  
जो हर चमक का गुलाम बनाकर 
उसे बटोरने की आजा़दी देते हैं 
जिनकी बदौलत अच्छे दिनों में
अच्छे से रहते हैं हम !

वे छड़ी घुमाकर खेतों में
अन्न की जगह उगा सकते हैं
इमारतें और चमकदार बस्तियाँ
वे खदेड़ सकते हैं धरती पुत्रों को
....

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