वह हंसती थी तो फूल झरते थे
पेड़ के पत्ते नाचते थे
मोंगरे की गंध
पूरे गांव में फैल जाती थी
सूरज निकलता था
बाहर अलसाया
मंत्र अर्थों के चेहरे ओढ़
निकल पड़ते थे
तीर्थ यात्रओं पर
वह हंसती थी
तो रात का जादू टूटता था
इस बा....
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हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं की भीड़ में अलग पहचान बनाने वाली 'पाखी' का प्रकाशन सितंबर, 2008 से नियमित जारी है।