फ़रहत दुर्रानी ‘शिकस्ता’

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किसी रिश्ते का रेशम झूट से सुलझा नहीं है
शिकस्ता अहद ओ पैमां से भी ये निभता नहीं है!

अभी तो दास्तां ये और भी लंबी खिंचेगी
कहानी में कोई हीरो अभी आया नहीं है!

नजर आती हैं चारों सिम्त चरवाहों की भेड़ें 
कहीं भी दूर तक इक आदमी दिखता नहीं है!

बहारें कैसे आएंगीं बयाबां में दिलों के
शजर नेकी के अब इंसां कहीं बोता नहीं है!

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