सालों पहले डॉ. प्रतिभा सिंह का कविता संग्रह ‘पंचकन्या’ पढ़ा था, उसकी समीक्षात्मक विवेचना की थी और उनके साहसिक कवि-कर्म की बानगी देखी थी। वह इतिहास की छात्र रही हैं, शिक्षिका हैं और साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन-सृजन कर रही हैं। उनके स्वर तनिक विरोधी हैं परंतु उनका विरोध स्त्री-पुरुष दोनों के प्रति है और सर्वाधिक आक्रोश अपने आस-पास, घर-परिवार, समाज में प्र....
