जीतेंद्र गुप्ता

आलोचनात्मक विवेक की यात्र

आधुनिक आलोचना के भारतीय इतिहास पर गौर करें, तो पाएंगे कि पिछली सदी के 60 और 70 के दशक में आलोचना ने साहित्य, सौंदर्यशास्त्र, राजनीति और दर्शन की सीमाओं का न केवल अतिक्रमण किया, बल्कि साहित्य से परे दूसरे ज्ञानानुशासनों को अधिक से अधिक ज्ञान-संपन्न भी किया। इस अंतर्संबंध के विकिेसत होने का आधार यह था कि बौद्धिकों के बीच लगभग सर्वानुमति थी कि ज्ञान का अंतिम लक्ष्य ....

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