आज उसे फिर से पागलपने का दौरा आया है और गांव में पटवारी भी। वह रोज की तरह चौक की कोष्ठ पर चढ़कर कुछ-न-कुछ बड़बड़ाए जा रही है। निगाहें वहीं लगी हैं जहां पटवारी और उसका चपरासी ग्रामीणों के साथ मिलकर पैमाइश में व्यस्त हैं। फीते थामे दाएं-बाएं ऊपर-नीचे नाप लिए जा रहे हैं।
भोर के लगभग साढ़े दस बज रहे होंगे, घाम की तपिस से कुलबुलाते पक्षी पानी के सोतों में आना-जाना कर र....
