राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ को केवल कहानियों, कविताओं और साहित्यिक बहसों की पत्रिका नहीं रहने दिया था। उन्होंने उसे अपने समय की बेचैनी में हस्तक्षेप करने वाला मंच बनाया। उनके लिए साहित्य का अर्थ केवल कहानियां, कविताएं या फिर आलोचनाओं और पुस्तकों के मूल्यांकन का संसार भर नहीं था, बल्कि उनके लिए साहित्य का असली अर्थ उस समाज के भीतर जाना था जिसमें वे वाक्य पैदा ह....
