क्रांति

क्रांति की कविताएं

यह धरती सिर्फ मेरी नहीं है

यह धरती सिर्फ मेरी नहीं_
उस केंचुए की भी है
जो कांक्रीट की मेरी बसाहट में
चाहता है बस मुट्ठी भर मिट्टी
है उस पंछी की भी
उजड़ा है घर जिसका
बनने को दरवाजा/मेरे घर का 
उन जुगनुओं की भी 
जो निकलते हैं
बस रातों में 
नहीं काबिले बर्दाश्त 
रोशनी जिन्हें 

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