प्रवीण ‘बनजारा’

प्रवीण ‘बनजारा’ की कविता

मैं बड़े होकर पत्ता बनूंगी

आज मैं एक कोंपल हूं
नवजात, रक्तिम
दुनिया से नए-नए हुए परिचय 
से उत्तेजित
हवा में इठलाती
जीवन का स्वागत करती
एक ताजा-ताजा कोंपल
पेड़ की डाल से लटकती
फुनगियों से घिरी
जीवन को दोनों हाथों से लूटती
चमकती धूप में
स्वयं भी चमकती
पेड़ की दृढ़ पकड़ के प्रति आश्वस्त
झूमती मदमाती<....

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