हमारे नहीं रहने के बाद हमारी किताबों का क्या होगा? खासकर हिंदी लेखकों को यह चिंता इन दिनों कुछ ज्यादा सता रही है। उन्होंने अपनी संततियों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाया है जो अब उन्हीं की किताबों का मोल समझने को तैयार नहीं है। वैसे भी जो नया समय है, उसमें किताबें पहले की तरह मूल्यवान नहीं रहीं। यह मान लिया गया है कि सूचना, संवेदना, ज्ञान और मनोरंजन के जो नए साधन सुल....
