विक्रम सिंह

सच बोलने जैसा कुछ नहीं

बोझ
दोस्त मनोज कुमार सिंह जो एक विद्यालय में हिंदी के शिक्षक थे। पीएच-डी- करने के बाद करीब 10 साल से प्रोफेसर होने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने कहा था, ‘अगर मुझे प्रोफेसर की नौकरी मिल जाएं तो मैं अंडमान निकोबार भी चला जाऊं। अगर नौकरी करनी है तो फिर जगह क्या देखनी।’
बस इसी बात से सब कुछ बिगड़ गया था और करीब तीन महीने पहले मिले ऑफर लेटर पर कई बार सोचने-वि....

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