जवाहर चौधरी

एक सुबह अंधेरा

रोज की तरह आनंदराव सुबह की सैर को निकले। इस वक्त साढ़े पांच बजा है। भोर का समय, अंधेरा रुखसत हो रहा है और रोशनी ने अंगड़ाई लेनी शुरू की है। हवा बह नहीं रही, लगता है रह-रहकर ठुमक रही है। उसमें शीतलता और ताजगी ऐसी कि मन पुलक उठे। यही समय होता है जब पक्षी भी चहचहाने लगते हैं। पेड़ों पर उनकी फुदकन जिस तरह से नए दिन का स्वागत करती है वह उत्साह से भर देने वाला है। इस वक्त प्रक....

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