यश मालवीय

यश मालवीय के पद

साधो! कुलपति की बलिहारी 

खड़े खड़े माइक पर करता, केवल दांत चियारी 
सत्ता ही जिसकी खातिर है, बनी बाप महतारी 
क्या जाने साहित्य कला संस्कृति की महिमा न्यारी 
हैं मनोज रूपड़ा न समझो, तुम भाजी तरकारी 
लिखें समय को क्या जाने ये अपसंस्कृति हत्यारी 
विद्या के मंदिर में बैठा कैसा अत्याचारी 
लेखक का अपमान कर रहा जैसे है मति मारी 
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