अशोक गुजराती

गलबहियां

मैंने जैसे ही दरवाजा खोला, झपटकर उसने मुझे बांहों में भर लिया और लगी बेतहाशा यहां-वहां चूमने---
कल शाम के बाद उससे अभी ही मुलाकात हो रही थी। मैंने उसे कल ही बता दिया था कि आज मेरे घर मेहमान आएंगेµउसे अकेले ही जाना पड़ेगा। उसके यूं बरबस आलिंगन में लेने से पहले जितना समय मुझे मिल पाया था, उसमें दीखे उसके सफेद यूनिफार्म और मुस्कुराते लेकिन शिथिल चेहरे ने बेबाक चु....

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