वेद प्रकाश

वेदप्रकाश की कविताएं

विकास का शोर और पहाड़ की खामोशी

अरावली बोली-
‘मैं केवल पत्थर नहीं, मैं काल हूं,
  मैं युगों की गवाह, मैं जीवन की ढाल हूं।
तपती लू को रोककर शहर को ठंडक देती,
मैं तुम्हारी सांसों का, पानी का, कल का सवाल हूं।
क्या तुम भूल गए?
मैं तुम्हारी नींव हूं, समझो या न समझो।’

इंसान हंसा (अहंकार में)-
‘तुम पुरातन हो, हम आधुनिक,
त....

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