तब भी...
आज से चालीस-पचास साल बाद,
और उसके भी पार,
जब निश्चित ही मैं कहीं नहीं रहूंगा,
न मेरा शरीर, न स्पर्श होगा,
लेकिन हां, मेरे हर शब्द तब भी
इसी ब्रह्मांड में ठहरे होंगे,
शायद मेरी बातें कभी चुपचाप,
तब उनके बीच से गुजरेंगी।
आज जो मुझसे थोड़े असहमत हैं,
उनकी नस्लें जब बैठ कभी,
बातें करेंगी और मेरा जिक्र आएगा, &....
