धनेश दत्त पांडेय

फसादों का सैलाब

‘साले काफिर की औलाद, जिसकी इबादत तू करता है उसकी शकल भी देखी है? रात को देख ले ओके तो वहीं फूं-फूं करके तेरा दम न निकल जाए? हूं, तेरा वह हनुमान जी और महादेव! ...बकता है... खिनजीर की दुम!’ उसने सामने वाले को शरारत से देखा।
‘और तू बे, कसाई की औलाद! खुदा-खुदा कहेगा और असहाय मेमियाती बकरी की गर्दन रेत कर उसके सहारे ही पुल सिरात (जहन्नुम के ऊपर से गुजरते हुए जन्नत तक जाने वाला पुल) प....

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