इस महावाचाल और लगभग चीखते हुए समय में विनोद कुमार शुक्ल ऐसे रचनाकार हैं जो चुप रहते हैं। उनका चुप रहना गोली चलने से पहले बंदूक के चुप जैसा है। वे बोलते कम हैं। खुलते कम हैं। ऐसी शख्सियत से संवाद कर उसके भीतर के रचनाकार के रहस्य को उकेरना एक कठिन कार्य है। उनसे संवाद का बीड़ा ‘पुस्तक वार्ता’ के वर्तमान संपादक राकेश श्रीमाल ने उठाया। इस संवाद में विनोद जी ....
