आत्मरति
इस रति की
दो ही गति होती है
शर्म स्खलित होती है
और आत्मा या
कि कह लें-
बुद्धि
लज्जित होती है।
रंग
रंगों को
इतनी तंग नजर से
न देखिए
मन की आंखों से
पढ़कर देख लीजिए
मैल जमा है कहां
उसे साफ कीजिए
उस चोले के
भोंडे किस्से हैं तमाम....
