कबीर पढ़ते-सुनते हुए
आत्मा की अतल गहराइयों से आती आवाज थी
जो झिस्सी (बूंदों) की तरह
उतरती जाती थी रेतीले ढूहों पर
रमता जाता था मन
ज्यूं रमता है जल धीरे-धीरे माटी में
माटी की काया घूम रही थी
कुम्हार की चाकी में
उसकी दोनों हथेलियों के बीच
ले रही थी आकार
उसी तरह जैसे
हवा के झोंकों....
