मनुष्यता का विश्वव्यापी उत्पीड़न जब उत्सव बन जाए, जीने का संघर्ष बदल जाए जब छटपटाहट में और जिजीविषा डिलिरियम में बदल जाए, तब एक विराट शून्य का जन्म होता है। कवि कुमार मुकुल इसी शून्य से मानवीय पीड़ा का ऐसा दस्तावेज तैयार करते नजर आते हैं, जो जीवन के संघर्ष क्षेत्र को आनंद का क्षेत्र बनाकर कर्म पथ पर चलते हुए सनातन सुगंध से भर देता है। इस कर्म पथ पर कुमार की कविता एक पक्षी-सी ....
