रजनी गुप्त

वाग्दत्ता

न चाहते न हुए भी विगत के टूटे-फूटे टुकड़े चटके आइने की तरह उसकी सूरत को बिगाड़ने लगते। कितने सालों तक वह शीशे के टूटे टुकड़ों को जतन से जोड़ती रही मगर हर बार अपनी टेढ़ी-मेढ़ी सूरत देखकर वह पस्त पड़ जाती। हकीकत की विकृत तस्वीरें पूरी ताकत से उसके वजूद को उधेड़ने में लगी रहीं। पहले जिन बातों को याद करते हुए उसके होंठ मुस्कराने लगते थे, आज वही मीठी बातें बुरी तरह चुभने लगीं।
‘सुन....

Subscribe Now

पाखी वीडियो


दि संडे पोस्ट

पूछताछ करें