नहीं कोलाहल नहीं शोर-गुल
रहा टहल गली में शार्दूल।
हों गोरू, शुनक या नर, नभचर
नहीं देख इसे कोई व्याकुल!
घुटक तिरस्कार, मूंद नख -प्रखर,
पड़े अचरज में वनराज बड़े।
यहां मन हैं निडर, तन स्थावर
कल होते थे जो भाग खड़े।
यह काया प्रचंड, भर नभ-गर्जन,
करती अनेक बस्तियां निर्ज....
