पहला दिन: मिट्टी की पुकार
प्रतिष्ठित कवि लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा ‘जब से आंख खुली है’ को पढ़ना सतपुड़ा की मिट्टी को हथेलियों में महसूस करने जैसा है। यह किताब कोई कागज का ढेर नहीं, बल्कि गुढ़ी गांव की धूल, गोंडी गीतों की लय, और एक गरीब परिवार की सांसों का दस्तावेज है। मंडलोई की भाषा में प्रकृति के सामीप्य वाली सादगी का जो जादू हैµसाधारण को असाधारण बना....
