सुनीता

डॉ. सुनीता की कविताएं

एक सांझ 

आह से उपजी आग 
दुनिया धुंध में लिपटी तभी कार्ल मार्क्स 
अपनी दाढ़ी में समय की राख समेटे उठे 
थोड़ी देर बादलों के रेशे गिनते बैठे रहे 
बगल की मेज पर
चक्करदार दरवेश-सी मुस्कान लिए 
रूमी कॉफी का सिप लेते मुस्कुरा रहे थे कि 
नंग-धड़ंग रिरियाते बच्चे 
रोटी के टुकड़े को ब्रह्मांड की तरह तोड़ते दिखे 
दो धाराओं की न....

Subscribe Now

पाखी वीडियो


दि संडे पोस्ट

पूछताछ करें