राहुल राजेश

गांव की याद

ढह-ढिमला गए घर का मोह करके क्या फायदा?
पर मोह है कि छूटता नहीं। रह-रहकर याद आ जाता है गांव। गांव का घर। घर का अंगना। दुआरी। खम्हार। परछत्ती। कुआं। छप्पर-छानी। याद आ जाता है वो पोखर जिसकी मेड़ से ऊपर उठता ललमुंहा सूरज बहुत सुंदर लगता था! जिसे कुआं से सटी परछत्ती से सुबह-सुबह देखते थे तो मन खुश हो जाता था।
बरसात में यह पोखर झील में बदल जाता था। पानी घर की परछत्ती ....

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