सबका मानना है कि आजकल बहुत लिखा जा रहा है। महिला लेखिकाओं की तो बाढ़-सी गई है। अभी अधिक समय नहीं हुआ उसे पाठशाला गए, लेकिन उसने धावा बोल दिया है कागज-कलम के उस खेमे पर जहां केवल पुरुषों की महफिल जुटा करती थी। पत्रकार पुरुष, संपादक पुरुष, प्रकाशक पुरुष, लेखक-रचनाकार पुरुष और, आलोचक-समालोचक तो पुरुष हुए ही। लंबे समय तक स्त्री की दस्तक अनसुनी रही है पुरुष वर्चस्व के इस क्षेत्र ....
