प्रेम जनमेजय

ज्यों-ज्यों बूड़े विश्वनाथ त्रिपाठीय रंग

हिंदी साहित्य में अपने शैशवकाल का वर्णन मैंने अपने अनेक संस्मरणों एवं मुझसे लिए साक्षात्कारों में किया है। समय का यथार्थ एक होता है जिसे भिन्न-भिन्न शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया जा सकता है। यह लगभग वैसे ही है जैसे बाजार से, भिन्न-भिन्न दुकानों से खरीदी एक ही वस्तु अलग-अलग दुकानों से अलग-अलग रैपर में मिल सकती है। इस संस्मरण का आंरभ भी मैं जिस भूमिका से कर रहा हूं, उसके ....

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