हिंदी साहित्य में अपने शैशवकाल का वर्णन मैंने अपने अनेक संस्मरणों एवं मुझसे लिए साक्षात्कारों में किया है। समय का यथार्थ एक होता है जिसे भिन्न-भिन्न शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया जा सकता है। यह लगभग वैसे ही है जैसे बाजार से, भिन्न-भिन्न दुकानों से खरीदी एक ही वस्तु अलग-अलग दुकानों से अलग-अलग रैपर में मिल सकती है। इस संस्मरण का आंरभ भी मैं जिस भूमिका से कर रहा हूं, उसके ....
