मुझे जीवन में पहली बार ‘ब्रह्मलोक’ अर्थात हिंदी-पट्टी में रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ है।
ब्रह्मदेव की मानिंद ब्रह्मलोक वासियों के चार शीश होते हैंµवे एक से सुनते हैं, एक से बोलते हैं, एक से सोचते हैं तथा उनका एक शीश पहले तीनों का संयोजन करता हुआ उनके सभी कार्यों को फलित करता है। यह बात भलीभांति जानते हुए भी, मैं हर बार किसी न किसी ‘ट्रस्ट-इश्यू’ की भेंट चढ़ जाया ....
