जब तक वह उस पोट्रेट को ठीक ढंग से देख पाती तब तक स्कूल की छुट्टी हो गई और जल्दबाजी में वह उस पोट्रेट को जी भर कर निहार भी नहीं पाई। फिर घर आकर तो फुरसत ही नहीं मिलती। लेकिन जब उस रात वह लेटी तो उसे फिर वह पोट्रेट याद आ गया, एकदम जीवंत-सा, मानो कोई आकर फ्रेम में बैठ गया हो। शायद वह उस घर में रहने वाले किसी बुजुर्ग का चित्र रहा होगा। उसे सहज ही अपने बाबा की याद आ गई, कितना भव्य-सा था ....
