रणविजय

 इंसाफ

मैं देख रहा हूं सामने दूर-दूर तक करियाई हरियाली बिछी हुई है। उनके बीच-बीच में पियरी पट्टियां भी बनी हैं, सीधी रेखा के अनुशासन से बगावती इधर-उधर भागी हुई, जैसे कोई बच्चा खानों में नया-नया रंग भरना सीख रहा हो। ज्यादातर एक रंग, पर कुछ आयत दूसरे रंग के। बयार एक सुस्त चाल से आती-जाती रह रही है, फिर भी जाड़े का वैसा अहसास नहीं हो रहा है जैसा पखवारे भर पहले था। आसमान से हलकी दिलखुश पील....

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