सूरज बादलों से आंख-मिचौली करते हुए रह-रह कर अपनी एक झलक दिखला रहा था। यूं आकाश में काले और भूरे बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। कई दिनों से बारिश नहीं हुई थी। उमस अपने शबाब पर थी। पेड़ों की पत्तियां मानो हिलना-डुलना ही भूल गईं थीं। हवा साकित थी।
रूपलाल ने चेहरे पर उभर आए गर्द युक्त पसीने को अपने गंदे से अंगोछे से साफ किया। उखड़ी सांसों को संतुलित किया। फिर अपनी साइकिल को सिंगल स्टैं....
