धनेश दत्त पांडेय

बाजार

मैं सत्तर साल का खूसट बूढ़ा हूं। पढ़ा-लिखा नालायक बेवकूफ बूढ़ा। बाबूजी पढ़ाने की लाख कोशिश कीहिन, नहीं पढ़ा; डिग्री लेता गया। इस डिग्री को पट्टे की तरह गले से बांधकर एक अदद नौकरी के लिए नगर-नगर घूमता रहा, लाख कोशिशें कर लीं, नहीं मिलनी थी, नहीं मिली। आदमी के अंश और मां की कोख से पैदा होकर भी डगर-डगर घूमते रहने वाला आवारा कुत्ता हो गया! इस आवारागर्दी की निस्बत लोगों को ठग-ठुग कर ....

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