कवि और कर्म
‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया
काहे का ताना काहे का बाना कौन तार से बीनी
चदरिया!’
संत कवि कबीर अगर जुलाहा न होते तो क्या ये अमर पंक्तियां लिख सकते थे?
‘मन चंगा/तो कठौती में गंगा!’
संत कवि रैदास अगर मोची न होते तो ये विलक्षण पंक्तियां लिख सकते थे?
‘कहते न बने सहते न बने/मन ही मन पीर पिरोबो क....
