कृष्ण कल्पित

कृति आलोचक से नहीं  आलोचक कृति से बनता है

कवि और कर्म

‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया 
 काहे का ताना काहे का बाना कौन तार से बीनी     
 चदरिया!’
संत कवि कबीर अगर जुलाहा न होते तो क्या ये अमर पंक्तियां लिख सकते थे?
‘मन चंगा/तो कठौती में गंगा!’
संत कवि रैदास अगर मोची न होते तो ये विलक्षण पंक्तियां लिख सकते थे?
‘कहते न बने सहते न बने/मन ही मन पीर पिरोबो क....

Subscribe Now

पाखी वीडियो


दि संडे पोस्ट

पूछताछ करें