अविनाश बंधु

अविनाश बंधु की ग़ज़लें

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सी बात का गम इधर भी नहीं है
मेरा अब कोई हमसफर भी नहीं है

दुआएं समेटे बढ़ा जा रहा हूं 
कोई और अब रहगुजर भी नहीं है

सहे क्या सितम हैं जमाने में हमने 
मेरे यार को तो खबर भी नहीं है

जो घर को बसाने की देते नसीहत
उन्हीं का यहां एक घर भी नहीं है

झुका दे कहां ‘बंधु’ सर आखिर अपना
ह....

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