जयनंदन करिश्माई कथाकार नहीं हैं। कथा में करिश्मा लंबे समय तक चलता भी नहीं है। नब्बे के दशक में दर्जनों कथाकार चमके। कुछ ने खुद को बचाए जरूर रखा, लेकिन ज्यादातर करिश्मा कर सिमट गए। फिर वही कथाकार ठहर पाए, जिनकी कहानियों में जीवन की धुन साफ-साफ सुनी जा सकती थी। जयनंदन की कहानियां उसी जीवन से निकलीं, जहां वे सांस ले रहे थे। जी-मरकर जीवन से नाता बनाए रखा था। एक और प्रभावी वजह ह....
