सत्यकाम

खूब लड़ी मर्दानी

तिथि याद नहीं, 1984-85 का वर्ष होगा। बाबूजी ने कहा एयरपोर्ट (पटना) चलना है। गाड़ी तो थी नहीं हमारे पास तो फिर मेरे भावी ससुराल से अंबेस्डर गाड़ी ली गई। बाबूजी गाड़ी में और मैं अपनी राजदूत मोटरसाइकिल पर। एयरपोर्ट से किसी को लेने जाना अपने आप में एक रोमांच होता था, उन दिनों। एकाध फ्रलाइट आती थी दिल्ली से। हां! एक फ्रलाइट काठमांडू से भी आती-जाती थी। इसलिए दुबले-पतले, सुविधाविहीन पटना....

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