सूरदास ने श्रीकृष्ण के प्रति अपने अपार प्रेम को ‘जैसे उड़ि जहाज को पंछि फिरी जहाज पै आवै’ कह पुकारा। ‘पाखी’ के संपादकीय दायित्वों को कई बार स्वेच्छा से छोड़ने और फिर हालातों के दवाब में पुनः वापसी करने को मैं ‘पाखी’ के प्रति अपना प्रेम अथवा समर्पण नहीं कह सकता। यह कहना सरासर झूठ होगा। इन्हें हालात चलते उठाया गया कदम कह पुकारा जाना सच के सबसे करीब होगा। पूर्ण सत्....
