तृणभूमि
कभी गाय चर जाती
घोडा खा जाता
कभी जल जाती
मसल दी जाती
कभी मरती
कभी जी उठती
हृदय में, हथेलियों पर
आंखों में या होंठों पर
समय या असमय
घास लेकिन पनपती रहती है
हंसिये के आक्रोश से बची
भीतर की बित्ता भर
तृणभूमि
वहीं पर वैसे ही
औंधे मुंह पड़ी रहती है।<....
