दैनंदिनी
कवि होने से ज्यादा
स्त्री होने का संबल है उनमें
बिंबों से ज्यादा
माथे का बल है उनमें
शिल्प से ज्यादा
संबंधों का संतुलन है उनमें
भाषा से ज्यादा
दुखों का मौन है उनमें
अर्थ से ज्यादा
अस्तित्व का संधान है उनमें
वे कविताएं नहीं
दैनंदिनी लिखती हैं अपनी।
मुर्दा आदमी
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