भाषा खुद को अभिव्यक्त करने का सिर्फ माध्यम ही नहीं है वरन् किसी भी भाषा को जानना-समझना, उस भाषा की समूची संस्कृति के साथ-साथ उस भाषा के समाज के विभिन्न सामाजिक पहलुओं को समझना भी है और जब बात अपनी मातृभाषा की हो, जिससे रोजी की वजह से दूरी बन गई हो, तब मौका पाते ही मन उस ओर दौड़ने लगता है जहां बचपन बीता है और गांव का सारा समाज उस बोली या भाषा में तमाम मौखिक कथाओं और गीतों के साथ ....
