एक चिट्ठी तुम्हारे नाम
एक मैं लौटूंगा, फिर लौट कर आऊंगा
ये घर, ये आंगन, ये दीवार
सब तो तुम्हारा ही है
तुम न होती
तो ये दीवार, ये छत, ये आंगन
घर नहीं होता
ये जो पीले
सूर्यमुखी खिले हैं
तुम्हारा ही यतन है
मेरे न रहने से
असहज हो जाती हो तुम
तुम्हारे असहज हो जाने से
ये दीवार, ये छत, ये आंगन
खो देती ह....
