विजय शर्मा

 सत्यदेव त्रिपाठी का संसार

इस किताब के प्रकाशन के काफी पहले इसके काफी अंश मैं पढ़ चुकी थी। न केवल पढ़ चुकी थी वरन इसके कुछ हिस्से का अपनी पुस्तक ‘साहित्य में रिश्ते’ में उपयोग भी कर चुकी हूं। मगर इन्हें एक स्थान पर किताब की शक्ल में हाथ में लेकर पढ़ने का सुख कुछ और है। और हां, इस किताब का लयात्मक-काव्यात्मक शीर्षकµ‘मूक मुखर प्रिय सहचर मोरे’ µआपको पढ़ने के लिए आकर्षित करता है।
मनुष्य ने पशु-प....

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