रजनी गुप्त

पिछले पन्ने की इबारतें

अंधेरी रात में बेफिक्र सोते हम सब कि अचानक सुनाई पड़ी दरवाजे पर होती लगातार दस्तक। सोते-सोते लगा, जैसे कहीं बादल फट पड़ा हो या ऊंचाई से कोई भारी भरकम चट्टान सीधे दरवाजे पर गिर पड़ी हो। आखिर कहां से लगातार आती आवाजें हैं ये? हड़बड़ाकर गहरी नींद से उठकर दादी को टटोला मगर वे पास में नहीं थीं। उधर सीधे दरवाजे पर जा पहुंची, जहां 8-10 लोग गर्दन नवाए खड़े थे। अरे, ये क्या? बैलगाड़ी में लहूलु....

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