भक्ति का रंग बहुत गाढ़ा होता है, किसी नामी पेंट से भी ज्यादा पक्का और टिकाऊ होता है। वह ऐसा रंग है जो लगाए से नहीं लगता और जब लग जाता है तो छुटाए से नहीं छूटता। वह सूरदास की कारी कमरि की तरह
होता है जिस पर कोई दूसरा रंग कभी नहीं चढ़ता...चढ़ै न
दूजो रंग।
जब मन किसी की भक्ति में रंग जाता है तो वह सूरदास हो जाता है। वह अंधा हो जाता है, अंधभक्त हो जाता है। उसे फिर बेशरम रंग....
