अभी मैं जहां खड़ा हूं, वह मेरी पिछली रिहाइश का इलाका है। नाम बदलने वाले इस दौर में भी इसका नाम अभी तक सलामत है। यही कुछ कम नहीं। मगर सिर्फ नाम भर ही बचा हुआ है। सूरत और मिजाज के तेवर रोज बदल रहे हैं। डोरंडा बाजार के तंग चौरस्ते के बीच में जो पीपल का पुराना पेड़ खड़ा था, वह आज भी खड़ा है। मगर उसके नीचे बना गोलाकार चबूतरा गाडि़यों को जगह देते-देते आधा रह गया है। सड़क क....
